तो आखिर इस बात का फैसला हो गया कि इस बार आईपीएल का आयोजन दक्षिण अफ्रीका में होगा। हालांकि, इस दौड़ में इंग्लैंड भी शामिल था, लेकिन बाजी दक्षिण अफ्रीका के हाथ आई।
खैर, चुनावों से तारीखों की टकराहट के कारण इसके इस बार भारत में होने पर तो पहले से ही संदेह जताया जा रहा था। खिलाडि़यों को खुश करने के लिए बोर्ड ने इसकी आयोजन की तारीखों को भी 8 दिन आगे बढ़ा दिया है। दरअसल, खिलाड़ी दबी जुबान में बोर्ड के इस कड़े कार्यक्रम का विरोध करने लगे थे। उन्हें अपने परिवार से मिलने का वक्त नहीं मिल रहा था।
वेसे, दक्षिण अफ्रीका का मौसम इस समय क्रिकेट के लिए माकूल माना जा रहा है, वहीं इंग्लैंड में इन दिनों बरसात के दिन चल रहे हैं, इसलिए इंग्लैंड इस दौड़ में पिछड गया।
लेकिन, इन सब बातों के बीच आईपीएल चैयरमेन ललित मोदी और क्रिकेट दक्षिण अफ्रीका के अध्यक्ष गेराल्ड मोयला की दोस्ती भी रंग लाई दिखती है। अब नए ताजा कार्यक्रम के अनुसार दक्षिण अफ्रीका के छह मैदानों में इस टूर्नामेंट के मैच खेले जाएंगे। इसके साथ ही इस बात का भी ख्याल रखा जाएगा कि मैचों का प्रसारण उस समय किया जाएगा ताकि भारतीय दर्शक टीवी पर मैच शाम चार बजे और आठ बजे ही देख पाएं। इससे यह बात तो साफ हो गई कि क्रिकेट अब स्टेडियम से ज्यादा टीवी का खेल हो गया है। कैमरा लोगों की आंख और सोच बन गया है। रोज आती नयी तकनीक दर्शकों को खेल के नए आयामों से रूबरू करवा रही है।
आईपीएल के बाहर जाने को भले ही देश की साख पर एक सवाल की नजर से देखा जा रहा हो, लेकिन एक बात और है कि इसके बाहर जाने से एक नए बाजार के दरवाजे भी तो खुल रहे हैं। नए लोग और नए चाहने वाले इस टूर्नामेंट से जुड़ रहे हैं। सचिन तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी आईपीएल के बाहर जाने पर अफसोस जता चुके हैं। इसके साथ ही, फ्रेंचाइजी तो यही चाहते थे कि आईपीएल का आयोजन भारत में ही हो, लेकिन जब सवाल यह उठा कि या तो इसका आयोजन कहीं और हो या फिर ना हो, तो फिर दूसरे ही रास्ते को ही बेहतर माना गया। खैर, जो कुछ हो आईपीएल तो विदेश चल पड़ा है। तो इस बार आईपीएल बन गया है एसएआईपीएल।
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Wednesday, March 25, 2009
Friday, January 30, 2009
आईपीएल में गेंदबाजों के साथ भेदभाव क्यों
भारत मल्होत्रा
क्रिकेट को हमेशा से ही बल्लेबाजों का खेल कहा जाता रहा है। यही वजह है कि गेंदबाजों को बल्लेबाजों के मुकाबले हमेशा कम अहमियत मिलती रही है। महेंद्र सिंह धोनी की बेस प्राइस 4 लाख अमेरिकी डॉलर थी, लेकिन नीलामी में उन्हें लगभग इसकी चौगुनी कीमत (15 लाख अमेरिकी डॉलर) मिलती है। दूसरे सेशन में पीटरसन की बेस प्राइस 13.5 लाख डॉलर तय होती है। माइकल क्लार्क भी मिलियन डॉलर बेबी बन जाते हैं। लेकिन, किसी भी गेंदबाज को इस कीमत के लायक नहीं समझा जाता। गेंद और बल्ले के इस खेल में गेंद के साथ यह भेदभाव आईपीएल में भी जारी है।
आईपीएल के दूसरे सीजन में इंग्लेंड के पूर्व कप्तान केविन पीटरसन की बेस प्राइस 13।5 लाख डॉलर तय की गई है। इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि वे आईपीएल के सबसे मंहगे खिलाड़ी बन जाएं। हालांकि, फिलहाल महेंद्र सिंह धोनी पिछले साल मिले 15 लाख अमेरिकी डॉलर के साथ आईपीएल के सबसे मंहगे खिलाड़ी हैं। लेकिन, पीटरसन की बेस प्राइस और उनकी मांग को देखते हुए यह कोई हैरत की बात नहीं कि वे धोनी को पीछे छोड़ आईपीएल के सबसे महंगे खिलाड़ी बन जाएं। आखिर पीटरसन एक जबर्दस्त बल्लेबाज हैं, उनके पास क्रिकेट के सारे शॉट्स मौजूद हैं। साथ ही, वे ‘स्विच हिटिंग’ के भी माहिर हैं। लंबे और गगनचुंबी शॉट्स खेलने में भी पीटरसन माहिर खिलाड़ी हैं। अगर धोनी और पीटरसन की बल्लेबाजी क्षमता को सामने रखें और थोड़ी देर के लिए भारतीय खिलाडि़यों के प्रति अपने झुकाव को छोड़ दें, तो बल्लेबाजी क्षमता के हिसाब से पीटरसन कहीं न कहीं धोनी से आगे ही खड़े नजर आते हैं। इस तुलना का उद्देश्य धोनी की क्षमताओं को कमतर करके आंकना कतई नहीं है। ऐसे में फ्रेंचाईजी अगर पीटरसन को धोनी से ज्यादा कीमत देकर खरीदते हैं तो इसमें परेशान होने जैसी कोई बात नजर नहीं आती।
पीटरसन ही नहीं, ऑस्ट्रेलियाई उपकप्तान माइकल क्लार्क के लिए भी 12.5 लाख डॉलर की भारी भरकम बेस प्राइस रखे जाने की खबर है। बतौर बल्लेबाज क्लार्क की प्रतिभा पर संदेह नहीं जताया जा सकता। लेकिन, फिर एक बात जो सामने आती है क्या भारी भरकम रकम के ऊपर सिर्फ बल्लेबाजों का ही हक है। क्या, क्रिकेट का दूसरा पहलू इस ईनाम का हकदार नहीं। आखिर, क्यों बेस प्राइस तय करते समय इन सब बातों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। क्या, यह सब नियम और कीमतें सिर्फ बल्लेबाजों के हितों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई लगती हैं? इस सवाल की वजह भी है। पीटरसन के हमवतन और वर्तमान में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ आलराउंडर माने जाने वाले एंड्रयू फ्लिंटॉफ की बेस प्राइस साढ़े नौ लाख डॉलर रखी गई है। फ्लिंटॉफ एक ऐसे खिलाड़ी हैं, जो किसी भी टीम में केवल अपनी बल्लेबाजी या गेंदबाजी के दम पर जगह बना सकते हैं। उन्होंने अपने प्रदर्शन से इस बात को कई मौकों पर साबित किया है। फटाफट क्रिकेट में तो उनकी उपयोगिता और बढ़ जाती है। वे आक्रामक बल्लेबाजी में माहिर हैं और बड़े शॉट लगाने की उनकी क्षमता पर किसी को संदेह नहीं है। अपने दम पर मैच का रुख पलटने का माद्दा रखते हैं फ्लिंटॉफ। भले ही उनके हाथ में गेंद हो या बल्ला। जानकर उन्हें कपिल देव, इमरान खान, रिचर्ड हैडली और इयान बॉथम जैसे महान आलरांउडरों की जमात में खड़ा करते हैं। तो, फिर फ्लिंटॉफ की बेस प्राइस पीटरसन और क्लार्क से कम क्यों? फ्लिंटॉफ के टीम में होने से टीम में संतुलन बढ़ जाता है। उनकी वजह से कप्तान के पास एक अतिरिक्त बल्लेबाज या गेंदबाज खिलाने का विकल्प खुल जाता है। फिर भी इस खिलाड़ी को उसकी प्रतिभा और उपयोगिता के अनुरुप क्यों नहीं मापा गया, यह सवाल समझ से परे है।
इस बात में कोई संदेह नहीं कि लोग फटाफट क्रिकेट के नए दौर में बल्लेबाजों को हावी होते देखना चाहते हैं। किसी गेंदबाज के बेहतरीन प्रदर्शन के बजाए लोग युसुफ पठान और सनथ जयसूर्या के लंबे लंबे शॉट्स देखने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं। 59 मैचों के इस टूर्नामेंट में 1702 चौके और 622 छक्के लगे। यानी एक मैच में 10 से ज्यादा छक्के। तो, क्या यह सब झमेला लोगों को खुश करने के लिए किया जा रहा है? बल्लेबाजों के मुकाबले गेंदबाजों और आलराउंडरों को कमतर कर क्यों आंका जा रहा है? पॉल कॉलिंगवुड के लिए बेस प्राइस 2 लाख डॉलर तय की गई है, माना कि पीटरसन एक बेहतर खिलाड़ी हैं, लेकिन क्या यह फर्क सात गुना से भी ज्यादा है। इसका जवाब है नहीं। आईपीएल को शुरुआत से ही बल्लेबाजों का खेल कहा गया। यह बात सच भी होती दिखी जब पहले ही मैच में ब्रेडन मैकुअलम ने 153 रनों की ताबड़तोड़ पारी खेल अपनी तरह के पहले टूर्नामेट का बेहतरीन आगाज किया।
लेकिन, गेंदबाजों ने आईपीएल में अपने हिस्से का काम किया। आईपीएल में खेले गए 59 मुकाबलों में एक तिहाई से ज्यादा मौके ऐसे रहे, जब आलरांउडर और गेंदबाज ‘मैन ऑफ द मैच’ का खिताब जीतने में सफल रहे। मनप्रीत सिंह गोनी, मखाया नतिनी, सुहैल तनवीर, शोएब अख्तर, शॉन पॉलक और धवल कुलकर्णी जैसे स्थापित और नए गेंदबाजों सहित यह लिस्ट लंबी है। सबसे खास बात यह कि ‘मोस्ट वैल्यूबल प्लेयर’ का खिताब एक ऑलराउंडर शेन वाटसन (राजस्थान रॉयल्स) ने ही जीता। 20 ओवरों के इस खेल में एक गेंदबाज के पास अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए महज 4 ही ओवर होते हैं। ऐसे में अगर राजस्थान रॉयल्स के सुहैल तनवीर चेन्नई सुपरकिंग्स के खिलाफ केवल चार ओवरों में ही 6 विकेट हासिल करता है, तो यह एक बड़ी उपलब्धि ही कही जाएगी। ऐसे में आईपीएल के कर्ताधर्ता यह क्यों भूल जाते हैं कि क्रिकेट गेंद और बल्ले का खेल है और ऐसे में गेंदबाजों को भी बराबर तवज्जो दी जानी चाहिए।
क्रिकेट को हमेशा से ही बल्लेबाजों का खेल कहा जाता रहा है। यही वजह है कि गेंदबाजों को बल्लेबाजों के मुकाबले हमेशा कम अहमियत मिलती रही है। महेंद्र सिंह धोनी की बेस प्राइस 4 लाख अमेरिकी डॉलर थी, लेकिन नीलामी में उन्हें लगभग इसकी चौगुनी कीमत (15 लाख अमेरिकी डॉलर) मिलती है। दूसरे सेशन में पीटरसन की बेस प्राइस 13.5 लाख डॉलर तय होती है। माइकल क्लार्क भी मिलियन डॉलर बेबी बन जाते हैं। लेकिन, किसी भी गेंदबाज को इस कीमत के लायक नहीं समझा जाता। गेंद और बल्ले के इस खेल में गेंद के साथ यह भेदभाव आईपीएल में भी जारी है।
आईपीएल के दूसरे सीजन में इंग्लेंड के पूर्व कप्तान केविन पीटरसन की बेस प्राइस 13।5 लाख डॉलर तय की गई है। इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि वे आईपीएल के सबसे मंहगे खिलाड़ी बन जाएं। हालांकि, फिलहाल महेंद्र सिंह धोनी पिछले साल मिले 15 लाख अमेरिकी डॉलर के साथ आईपीएल के सबसे मंहगे खिलाड़ी हैं। लेकिन, पीटरसन की बेस प्राइस और उनकी मांग को देखते हुए यह कोई हैरत की बात नहीं कि वे धोनी को पीछे छोड़ आईपीएल के सबसे महंगे खिलाड़ी बन जाएं। आखिर पीटरसन एक जबर्दस्त बल्लेबाज हैं, उनके पास क्रिकेट के सारे शॉट्स मौजूद हैं। साथ ही, वे ‘स्विच हिटिंग’ के भी माहिर हैं। लंबे और गगनचुंबी शॉट्स खेलने में भी पीटरसन माहिर खिलाड़ी हैं। अगर धोनी और पीटरसन की बल्लेबाजी क्षमता को सामने रखें और थोड़ी देर के लिए भारतीय खिलाडि़यों के प्रति अपने झुकाव को छोड़ दें, तो बल्लेबाजी क्षमता के हिसाब से पीटरसन कहीं न कहीं धोनी से आगे ही खड़े नजर आते हैं। इस तुलना का उद्देश्य धोनी की क्षमताओं को कमतर करके आंकना कतई नहीं है। ऐसे में फ्रेंचाईजी अगर पीटरसन को धोनी से ज्यादा कीमत देकर खरीदते हैं तो इसमें परेशान होने जैसी कोई बात नजर नहीं आती।
पीटरसन ही नहीं, ऑस्ट्रेलियाई उपकप्तान माइकल क्लार्क के लिए भी 12.5 लाख डॉलर की भारी भरकम बेस प्राइस रखे जाने की खबर है। बतौर बल्लेबाज क्लार्क की प्रतिभा पर संदेह नहीं जताया जा सकता। लेकिन, फिर एक बात जो सामने आती है क्या भारी भरकम रकम के ऊपर सिर्फ बल्लेबाजों का ही हक है। क्या, क्रिकेट का दूसरा पहलू इस ईनाम का हकदार नहीं। आखिर, क्यों बेस प्राइस तय करते समय इन सब बातों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। क्या, यह सब नियम और कीमतें सिर्फ बल्लेबाजों के हितों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई लगती हैं? इस सवाल की वजह भी है। पीटरसन के हमवतन और वर्तमान में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ आलराउंडर माने जाने वाले एंड्रयू फ्लिंटॉफ की बेस प्राइस साढ़े नौ लाख डॉलर रखी गई है। फ्लिंटॉफ एक ऐसे खिलाड़ी हैं, जो किसी भी टीम में केवल अपनी बल्लेबाजी या गेंदबाजी के दम पर जगह बना सकते हैं। उन्होंने अपने प्रदर्शन से इस बात को कई मौकों पर साबित किया है। फटाफट क्रिकेट में तो उनकी उपयोगिता और बढ़ जाती है। वे आक्रामक बल्लेबाजी में माहिर हैं और बड़े शॉट लगाने की उनकी क्षमता पर किसी को संदेह नहीं है। अपने दम पर मैच का रुख पलटने का माद्दा रखते हैं फ्लिंटॉफ। भले ही उनके हाथ में गेंद हो या बल्ला। जानकर उन्हें कपिल देव, इमरान खान, रिचर्ड हैडली और इयान बॉथम जैसे महान आलरांउडरों की जमात में खड़ा करते हैं। तो, फिर फ्लिंटॉफ की बेस प्राइस पीटरसन और क्लार्क से कम क्यों? फ्लिंटॉफ के टीम में होने से टीम में संतुलन बढ़ जाता है। उनकी वजह से कप्तान के पास एक अतिरिक्त बल्लेबाज या गेंदबाज खिलाने का विकल्प खुल जाता है। फिर भी इस खिलाड़ी को उसकी प्रतिभा और उपयोगिता के अनुरुप क्यों नहीं मापा गया, यह सवाल समझ से परे है।
इस बात में कोई संदेह नहीं कि लोग फटाफट क्रिकेट के नए दौर में बल्लेबाजों को हावी होते देखना चाहते हैं। किसी गेंदबाज के बेहतरीन प्रदर्शन के बजाए लोग युसुफ पठान और सनथ जयसूर्या के लंबे लंबे शॉट्स देखने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं। 59 मैचों के इस टूर्नामेंट में 1702 चौके और 622 छक्के लगे। यानी एक मैच में 10 से ज्यादा छक्के। तो, क्या यह सब झमेला लोगों को खुश करने के लिए किया जा रहा है? बल्लेबाजों के मुकाबले गेंदबाजों और आलराउंडरों को कमतर कर क्यों आंका जा रहा है? पॉल कॉलिंगवुड के लिए बेस प्राइस 2 लाख डॉलर तय की गई है, माना कि पीटरसन एक बेहतर खिलाड़ी हैं, लेकिन क्या यह फर्क सात गुना से भी ज्यादा है। इसका जवाब है नहीं। आईपीएल को शुरुआत से ही बल्लेबाजों का खेल कहा गया। यह बात सच भी होती दिखी जब पहले ही मैच में ब्रेडन मैकुअलम ने 153 रनों की ताबड़तोड़ पारी खेल अपनी तरह के पहले टूर्नामेट का बेहतरीन आगाज किया।
लेकिन, गेंदबाजों ने आईपीएल में अपने हिस्से का काम किया। आईपीएल में खेले गए 59 मुकाबलों में एक तिहाई से ज्यादा मौके ऐसे रहे, जब आलरांउडर और गेंदबाज ‘मैन ऑफ द मैच’ का खिताब जीतने में सफल रहे। मनप्रीत सिंह गोनी, मखाया नतिनी, सुहैल तनवीर, शोएब अख्तर, शॉन पॉलक और धवल कुलकर्णी जैसे स्थापित और नए गेंदबाजों सहित यह लिस्ट लंबी है। सबसे खास बात यह कि ‘मोस्ट वैल्यूबल प्लेयर’ का खिताब एक ऑलराउंडर शेन वाटसन (राजस्थान रॉयल्स) ने ही जीता। 20 ओवरों के इस खेल में एक गेंदबाज के पास अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए महज 4 ही ओवर होते हैं। ऐसे में अगर राजस्थान रॉयल्स के सुहैल तनवीर चेन्नई सुपरकिंग्स के खिलाफ केवल चार ओवरों में ही 6 विकेट हासिल करता है, तो यह एक बड़ी उपलब्धि ही कही जाएगी। ऐसे में आईपीएल के कर्ताधर्ता यह क्यों भूल जाते हैं कि क्रिकेट गेंद और बल्ले का खेल है और ऐसे में गेंदबाजों को भी बराबर तवज्जो दी जानी चाहिए।
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Thursday, January 22, 2009
ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों के बिना भी आईपीएल का रोमांच होगा चरम पर
ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग के अपनी टीम के खिलाडि़यों के आईपीएल के दूसरे सीजन में भाग न लेने संबंधी बयान में उनकी अपनी चिंता ज्यादा जाहिर होती है। विपक्षी टीमों से मिल रही कड़ी चुनौती को देखते हुए पोंटिंग की वास्तविक चिंता विश्व क्रिकेट में अपनी टीम की बादशाहत को बनाए रखना है। वैसे भी, खेल तो कभी किसी के लिए रुकता नहीं।
भारत मल्होत्रा
राजकपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' का एक मशहूर डॉयलॉग है 'शो मस्ट गो ऑन'। यानि कोई रहे या न रहे शो चलते रहना चाहिए। ऑस्ट्रलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग को भी यह बात समझ लेनी चाहिए कि भले ही वो और उनकी टीम के खिलाड़ी आईपीएल में भाग न लें, लेकिन आईपीएल इस बार भी कामयाब होगा और उम्मीद की जानी चाहिए कि पिछली बार से ज्यादा।
ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग ने यह कह कर कि आईपीएल के दूसरे सीजन से ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी दूर रह सकते हैं, एक नई बहस को जन्म दे दिया है। पोंटिंग का कहना है कि वे एशेज से पहले अपने खिलाडियों को पूरी तरह फिट रखना चाहते हैं।
तो ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों जैसे रिकी पोंटिंग, ब्रेट ली, एंड्रयू सायमंड्स आदि के न आने से इस टूर्नामेंट की चमक पर असर पड़ेगा। शायद नहीं, मेरा यह कहने के पीछे जायज वजह भी है। आईपीएल के पहले सीजन में दर्जन भर से ज्यादा ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों ने भाग लिया था। इनमें मैथ्यू हेडन, रिकी पोंटिंग, शॉन मॉर्श, ब्रेट ली, जेम्स होप्स, माइकल हसी जैसे सितारे शामिल थे।
वैसे भी, पिछली बार भी ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी आईपीएल में ज्यादा वक्त तक शिरकत करते नजर नहीं आए थे। मैथ्यू हेडन, रिकी पोंटिग, माइकल हसी और ब्रेट ली जैसे उस समय के ऑस्ट्रेलियाई टीम के खिलाडि़यों ने अपनी अपनी टीम की ओर से सिर्फ चार आईपीएल मैचों में ही भाग लिया था। मैथ्यू हेडन और माइकल हसी ने अपना आईपीएल में आखिरी मैच 29 अप्रैल को ही खेला था जबकि उनकी टीम चेन्नई सुपरकिंग्स ने टूर्नामेंट का फाइनल एक जून को खेला था। यानि, उनके जाने के एक महीने बाद भी आईपीएल न सिर्फ चला था बल्कि कामयाबी के साथ चला था। दूसरी बात, मौजूदा ऑस्ट्रेलियाई टीम में से सिर्फ कप्तान रिकी पोंटिंग, ब्रेट ली, माइकल हसी, साइमन कैटिच, एंड्रयू सायमंड्स और शॉन मॉर्श (रिटायर्ट हुए मैथ्यू हेडन के स्थान के दावेदार) का ही एशेज के लिए चुना जाना संभव नजर आता है। और, अगर वे खेलते भी हैं तो वे भी शायद कुछ ही मैचों के लिए। तो, इन सितारों के न होने से कुछ ज्यादा फर्क पड़ता नजर नहीं आ रहा।
ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों के न आने से आईपीएल की लोकप्रियता पर असर पड़ेगा ऐसा होता नजर नहीं आ रहा। आईपीएल को उसके कॉन्सेप्ट और खेल के स्तर और रोमांच के कारण मिली थी। यहां पर ऐसे खिलाडि़यों ने भी वाहवाही बटोरी जिनके बारे में इस टूर्नामेंट से पहले कोई जानता तक नहीं था।
ऑस्ट्रेलियाई कप्तान की इस बात के पीछे उनकी एक चिंता भी साफ नजर आती है। खराब दौर से गुजर रही कंगारू टीम की बादशाहत पर खतरा मंडरा रहा है। पहले भारत से सीरीज हार कर लौटना, उसके बाद अपने ही घर में दक्षिण अफ्रीकी टीम से सीरीज की हार। ऊपर से आईसीसी ने उससे नम्बर एक की ट्रॉफी जो पिछले आठ सालों से उसके पास थी वो भी वापस मंगा ली है। तो, पोंटिंग एंड कंपनी के लिए अब मुसीबतें पहले से ज्यादा हो गयी हैं। दुनिया भर की टीमें अब ऑस्ट्रेलिया को उतना बड़ा खतरा नहीं मानते जितना कि कुछ वक्त तक पहले तक मानते थे। और रही बात एशेज की तो वह सीरीज ऑस्ट्रेलिया के लिए इज्जत का सवाल है। भारत दौरे पर आई इंग्लैंड ने आतंकवादी हमले के बाद जिस तरह का जज्बा दिखाया था वो काबिले-तारीफ था। इंग्लैंड ने लोगों की वाहवाही लूटी थी। मैदान पर भी इंग्लैंड के खेल को ऑस्ट्रेलिया से बेहतर आंका गया। ऐसे में इस साल अपने ही घर में होने वाल एशेज के लिए इंग्लैंड कंगारुओं पर भारी ही नजर आ रही है। शायद पोंटिंग भी जानते हैं कि अपनी कप्तानी और नम्बर एक की सीट बचाने के लिए उनके लिए यह सीरीज कितनी महत्वपूर्ण
भारत मल्होत्रा
राजकपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' का एक मशहूर डॉयलॉग है 'शो मस्ट गो ऑन'। यानि कोई रहे या न रहे शो चलते रहना चाहिए। ऑस्ट्रलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग को भी यह बात समझ लेनी चाहिए कि भले ही वो और उनकी टीम के खिलाड़ी आईपीएल में भाग न लें, लेकिन आईपीएल इस बार भी कामयाब होगा और उम्मीद की जानी चाहिए कि पिछली बार से ज्यादा।
ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग ने यह कह कर कि आईपीएल के दूसरे सीजन से ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी दूर रह सकते हैं, एक नई बहस को जन्म दे दिया है। पोंटिंग का कहना है कि वे एशेज से पहले अपने खिलाडियों को पूरी तरह फिट रखना चाहते हैं।
तो ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों जैसे रिकी पोंटिंग, ब्रेट ली, एंड्रयू सायमंड्स आदि के न आने से इस टूर्नामेंट की चमक पर असर पड़ेगा। शायद नहीं, मेरा यह कहने के पीछे जायज वजह भी है। आईपीएल के पहले सीजन में दर्जन भर से ज्यादा ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों ने भाग लिया था। इनमें मैथ्यू हेडन, रिकी पोंटिंग, शॉन मॉर्श, ब्रेट ली, जेम्स होप्स, माइकल हसी जैसे सितारे शामिल थे।
वैसे भी, पिछली बार भी ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी आईपीएल में ज्यादा वक्त तक शिरकत करते नजर नहीं आए थे। मैथ्यू हेडन, रिकी पोंटिग, माइकल हसी और ब्रेट ली जैसे उस समय के ऑस्ट्रेलियाई टीम के खिलाडि़यों ने अपनी अपनी टीम की ओर से सिर्फ चार आईपीएल मैचों में ही भाग लिया था। मैथ्यू हेडन और माइकल हसी ने अपना आईपीएल में आखिरी मैच 29 अप्रैल को ही खेला था जबकि उनकी टीम चेन्नई सुपरकिंग्स ने टूर्नामेंट का फाइनल एक जून को खेला था। यानि, उनके जाने के एक महीने बाद भी आईपीएल न सिर्फ चला था बल्कि कामयाबी के साथ चला था। दूसरी बात, मौजूदा ऑस्ट्रेलियाई टीम में से सिर्फ कप्तान रिकी पोंटिंग, ब्रेट ली, माइकल हसी, साइमन कैटिच, एंड्रयू सायमंड्स और शॉन मॉर्श (रिटायर्ट हुए मैथ्यू हेडन के स्थान के दावेदार) का ही एशेज के लिए चुना जाना संभव नजर आता है। और, अगर वे खेलते भी हैं तो वे भी शायद कुछ ही मैचों के लिए। तो, इन सितारों के न होने से कुछ ज्यादा फर्क पड़ता नजर नहीं आ रहा।
ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों के न आने से आईपीएल की लोकप्रियता पर असर पड़ेगा ऐसा होता नजर नहीं आ रहा। आईपीएल को उसके कॉन्सेप्ट और खेल के स्तर और रोमांच के कारण मिली थी। यहां पर ऐसे खिलाडि़यों ने भी वाहवाही बटोरी जिनके बारे में इस टूर्नामेंट से पहले कोई जानता तक नहीं था।
ऑस्ट्रेलियाई कप्तान की इस बात के पीछे उनकी एक चिंता भी साफ नजर आती है। खराब दौर से गुजर रही कंगारू टीम की बादशाहत पर खतरा मंडरा रहा है। पहले भारत से सीरीज हार कर लौटना, उसके बाद अपने ही घर में दक्षिण अफ्रीकी टीम से सीरीज की हार। ऊपर से आईसीसी ने उससे नम्बर एक की ट्रॉफी जो पिछले आठ सालों से उसके पास थी वो भी वापस मंगा ली है। तो, पोंटिंग एंड कंपनी के लिए अब मुसीबतें पहले से ज्यादा हो गयी हैं। दुनिया भर की टीमें अब ऑस्ट्रेलिया को उतना बड़ा खतरा नहीं मानते जितना कि कुछ वक्त तक पहले तक मानते थे। और रही बात एशेज की तो वह सीरीज ऑस्ट्रेलिया के लिए इज्जत का सवाल है। भारत दौरे पर आई इंग्लैंड ने आतंकवादी हमले के बाद जिस तरह का जज्बा दिखाया था वो काबिले-तारीफ था। इंग्लैंड ने लोगों की वाहवाही लूटी थी। मैदान पर भी इंग्लैंड के खेल को ऑस्ट्रेलिया से बेहतर आंका गया। ऐसे में इस साल अपने ही घर में होने वाल एशेज के लिए इंग्लैंड कंगारुओं पर भारी ही नजर आ रही है। शायद पोंटिंग भी जानते हैं कि अपनी कप्तानी और नम्बर एक की सीट बचाने के लिए उनके लिए यह सीरीज कितनी महत्वपूर्ण
Tuesday, September 16, 2008
इस बार पूरी तरह से तैयार है आईसीएल
इंडियन क्रिकेट लीग और इंडियन प्रीमियर लीग के बीच प्रतिद्वंद्विता क्रिकेट में जगजाहिर है। एक दूसरे से आगे निकलने की इस होड़ में पिछले साल आईसीएल पीछे रह गया था, लेकिन इस बार की तैयारियां कुछ खास हैं। इसके दूसरे सीजन में आईसीएल के अधिकारी न केवल बुनियादी कमियों को दूर करने में लगे हैं, बल्कि नए खिलाडि़यों को लीग में शामिल कर दर्शकों को लुभाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते।
भारत मल्होत्रापहले आया आईसीएल- खिलाडि़यों के लिए बड़ा पैसा कमाने के पहले मौके के रूप में। भारत में टी-20 क्रिकेट की वास्तविक शुरुआत का श्रेय आईसीएल को ही है। एस्सेल ग्रुप द्वारा संचालित इस लीग में देश-विदेश के कई खिलाडी शामिल हुए। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद इसे वह सफलता नहीं मिली, जिसकी उम्मीद थी। फिर आया आईपीएल- बीसीसीआई द्वारा संचालित इस लीग ने भी 20-20 फॉर्मेट को अपनाया। ताज्जुब की बात तो यह है कि आईपीएल को अपार सफलता मिली और आईसीएल गुमनामी के अंधेरे में खो गया। कपिल देव का यह बयान कि आईसीएल क्रिकेट में बेहतर रहा और आईपीएल मॉर्केटिंग में- दरअसल, यह बात कपिल के दर्द की ओर इशारा करता है, वो उस सफलता को हासिल नहीं कर पाए जिसकी उम्मीद उन्होंने की थी। सही मायनो में आईपीएल की सफलता ने आईसीएल के लिए मुसीबतें बढ़ा दी हैं। भारत ने टी-20 के फॉरमेट की शुरुआत आईसीएल ने की मगर बावजूद इसके वह लोगों को अपनी ओर खींचने में नाकामयाब रहा। वहीं दूसरी ओर आईपीएल ने सफलता के नए आयाम तय कर दिए। आईसीएल को पता है कि अब उसके लिए खुद को बचाए रखने के लिए काफी मेहनत करने की जरूरत है। आईसीएल अब अपने दूसरे सीजन के साथ आने के लिए तैयार है। पिछली बार इस टूर्नामेंट को इतनी सफलता न मिली हो, मगर इस बार उनकी पूरी कोशिश है इस तथाकथित बागी टूर्नामेंट को एक सफल आयोजन बनाया जा सके। आईसीएल को अभी तक किसी भी क्रिकेट बोर्ड की ओर से मान्यता नहीं मिली है और यही बात उसके आगे बढ़ने में सबसे बड़ी रुकावट बन रही है। सभी देशों के क्रिकेट बोर्ड इस बात को साफ तौर पर कह चुके हैं कि जो भी खिलाड़ी आईसीएल का हिस्सा बनेगा वह राष्ट्रीय टीम में नहीं चुना जाएगा, यानी उसका अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर समाप्त हो जाएगा। पिछले सीजन में आईसीएल के पास एक भी अंतरराष्ट्रीय स्तर का स्टेडियम नहीं था और न ही प्रायोजन के स्तर पर ही कोई स्थापित नाम उनसे जुड़ने को तैयार हुआ था। इन सब बातों से निजात पाने के लिए ही आईसीएल इस बार किसी भी तरह की कोताही बरतने की गलती नहीं करना चाहता। कपिल एंड कंपनी जानते हैं कि अगर इस बार वे अपना स्तर और प्रदर्शन नहीं जुटा पाए तो उनके लिए दोबारा यहां से संभलना काफी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए इस दूसरे सीजन की तैयारी के लिए काफी समय पहले ही तैयारी शुरू कर दी गई। इस बार आईसीएल का आयोजन पिछली बार से बड़े स्तर पर करवाया जा रहा है। अच्छी सुविधाओं के नाम पर नए मैदानों का जुगाड़ किया जा रहा है तो नए खिलाडि़यों को साथ करने की भी हरसंभव कोशिश की जा रही है। साथ ही इस बार तो उन्हें कुछ प्रायोजक भी मिलने लगे हैं। इस बार आईसीएल को अहमदाबाद के एक स्टेडियम में खेलने का मौका मिलेगा, इसके साथ ही यहां पर ईडन गॉर्डन को लेकर भी आईसीएल अधिकारी कोशिश कर रहे हैं। आईसीएल के साथ खिलाडि़यों के जुड़ने और साथ छोड़ने का एक सिलसिला चलता रहा है। ब्रॉयन लारा इसके साथ जुड़े मगर खेलने में उनका मन यहां कभी खेलने में नहीं लगा। शेन वॉर्न और ग्लेन मैक्ग्रा की भी इसके साथ जुड़ने की खबरें आई थीं, मगर बाद में दोनों ही सितारे आईसीएल को ठेंगा दिखाकर आईपीएल में शामिल हो गए। मोहम्मद यूसुफ भी आईसीएल में शामिल होने को तैयार थे मगर बाद में वे आईपीएल में शामिल होने को ललचाते रहे। हांलांकि, उन्हें वहां भी जगह नहीं मिली। इस सबके बीच बांग्लादेश के 14 खिलाडियों के आईसीएल के साथ जुड़ने की बात सामने आई है। आईसीएल के लिए एक बड़ी खुशखबरी है कि टेस्ट खेलने वाले किसी देश के खिलाड़ी उसके साथ जुड़ रहे हैं।
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