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Monday, September 22, 2008

नए जरूर हैं मगर कमजोर नहीं हैं कंगारू

टीम ऑस्‍ट्रेलिया बॉर्डर-गावस्‍कर ट्रॉफी खेलने के लिए भारत आ चुकी है। सीरीज शुरू होने से पहले ऑस्‍ट्रेलियन टीम मैनेजमेंट की ओर से लगातार ऐसे बयान आ रहे हैं जो टीम के अनुभवहीन होने की ओर इशारा करती हैं। हो सकता है यह बात कई मायनों में सही हो, लेकिन इसके दूसरे पहलू की ओर देखें तो एक अलग ही तस्‍वीर उभर कर सामने आती है।
ऑस्‍ट्रेलिया की मौजूदा टीम में केवल मैथ्‍यू हेडन, माइकल क्‍लार्क, कप्‍तान पोंटिंग और साइमन कैटिच ही ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्‍होंने भारत में टेस्‍ट मैच खेला है। 15-सदस्‍यीय इस टीम में चार खिलाड़ी तो ऐसे हैं, जिन्‍होंने ऑस्‍ट्रेलिया के लिए अभी तक कोई टेस्‍ट मैच नहीं खेला है। मगर इसके बावजूद इन्‍हें अनुभवहीन कहना तथ्‍यों का एकपक्षीय मूल्‍यांकन हो सकता है। टीम में शामिल माइकल हसी, फिल जैक्‍स, डॉग बालिंगर जैसे तमाम ऐसे खिलाड़ी हैं जिनके पास घरेलू स्‍तर पर काफी अनुभव है। बॉलिंगर ने फर्स्‍ट क्‍लास क्रिकेट में 45 मैचों में 137 विकेट हासिल किए हैं, जो इस बाएं हाथ के तेज गेंदबाज की क्षमता को बताता है। बॉलिंगर वर्तमान में भारत दौरे पर आई ऑस्‍ट्रेलिया 'ए' टीम में भी शामिल हैं। जस्टिन लेंगर के संन्‍यास के बाद टीम में शामिल किए गए फिल जैक्‍स ओपनिंग में मैथ्‍यू हेडन के नए जोड़ीदार हैं। जैक्‍स भारतीय दर्शकों के लिए नए हो सकते हैं, लेकिन उन्‍होंने घरेलू मुकाबलों में 11605 रन बनाए हैं। टेस्‍ट मैचों में भी उनका औसत 45 से ज्‍यादा है। माइकल हसी ने भले ही भारत में कोई टेस्‍ट मैच न खेला हो मगर उनकी बल्‍लेबाजी क्षमता से हर कोई वाकिफ है। टेस्‍ट मैचों में उनकी बल्‍लेबाजी का औसत 68 के ऊपर है, जो डॉन ब्रैडमेन के बाद दूसरा सबसे अच्‍छा औसत है। इसके अलावा ऑस्‍ट्रेलिया के घरेलू मैचों में हसी करीब 18 हजार रन बना चुके हैं।एंड्रयू सायमंड्स की अनुपस्थिति में टीम में ऑलराउंडर की हैसियत से शामिल किए गए शेन वाटसन आईपीएल के दौरान 'प्‍लेयर ऑफ द टूर्नामेंट' रहे थे। अब भारत में टेस्‍ट मैच खेलने के नाम पर उनके पास अनुभव भले न हो, मगर बल्‍ले और गेंद से उनकी क्षमता मैच का रुख बदलने का माद्दा रखती है। गेंदबाजी की कमान संभाल रहे ब्रेट ली किसी पहचान के मोहताज नहीं है। ली ने भारत में टेस्‍ट मैच भले न खेले हों, मगर वह ऑस्‍ट्रेलिया के लिए 68 टेस्‍ट मैच खेल चुके हें। इसके अलावा भारत में 12 वनडे और आईपीएल के चार मैचों का तर्जुबा भी उनके साथ है। टीम में शामिल मिशेल जॉनसन भी भारतीय बल्‍लेबाजी के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं। जॉनसन ने बड़ोदरा में खेले गए एक वनडे मैच में 10 ओवरों में 26 रन देकर पांच भारतीय बल्‍लेबाजों को अपना शिकार बनाया था। हालांकि भारत में टेस्‍ट मैच खेलने के नाम पर उनका भी खाता खाली है। स्‍टुअर्ट क्‍लॉर्क अपनी लाइन और लैंग्‍थ से बल्‍लेबाजों के लिए परेशानी का सबब बनते रहे हैं। भारत में पहली बार टेस्‍ट मैच खेलने से पहले क्‍लॉर्क 18 टेस्‍ट मैचों में 81 विकेट लेकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। विकेटकीपिंग मे एडम गिलक्रिस्‍ट के संन्‍यास लेने के बाद टीम में आए ब्रेड हैडिन के घरेलू खाते में 5 हजार से ज्‍यादा रन बनाना उनकी प्रतिभा को दिखाता है। वैसे खुद को गिलक्रिस्‍ट के दस्‍तानों में फिट कर पाना हैडिन के लिए किसी चैलेंज से कम नहीं होगा। कुल मिलाकर यह तो माना जा सकता है कि भारत दौरे पर आई ऑस्‍ट्रेलिया की यह टीम उसकी सर्वश्रेष्‍ठ टीम नहीं है, लेकिन अनुभवहीन कहकर उसे सिरे से खारिज करना खतरनाक हो सकता है।सिर्फ अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट का अनुभव ही अच्‍छे प्रदर्शन का पैमाना नहीं होता। जहां तक ऑस्‍ट्रेलियन टीम मैनेजमेंट की बात है, तो ये बयान उनके माइंड गेम का नया रूप हो सकता है। उनका यह प्रयास भारतीय टीम को कंफर्ट जोन में धकेलने के बाद उन पर चोट करने की रणनीति का एक हिस्‍सा हो सकता है। भारत को इस बात का ख्‍याल रखना पड़ेगा कि वे किसी भी लिहाज से कंगारूओं को हल्‍के में लेने की भूल न करे वरना, कहीं साल 2005 का इतिहास दोहराया न जाए।

Sunday, September 21, 2008

भारत बनाम ऑस्‍ट्रेलिया, सबसे बड़ा मुकाबला

पिछले कुछ सालों में भारत-ऑस्‍ट्रेलिया मुकाबलों में क्रिकेट का जो रोमांच और शानदार स्‍तर देखने को मिला है, उसके आगे दूसरी श्रृंखलाओं की चमक फीकी पड़ गई है। चाहे वह ऑस्‍ट्रेलिया-इंग्‍लैंड की एशेज सीरीज हो या फिर भारत-पाक सीरीज। आज की तारीख में बिना शक कहा जा सकता है कि भारत-ऑस्‍ट्रेलिया सीरीज दुनिया की सर्वश्रेष्‍ठ बन गई है।
साल 2008 तारीख 9 अक्‍टूबर टेस्‍ट क्रिकेट के इतिहास का एक अहम दिन, जब भारत और ऑस्‍ट्रेलिया की टीमें जब बार्डर-गावस्‍कर ट्रॉफी पर कब्‍जा जमाने के लिए आमने-सामने होंगी। क्रिकेट का रोमांच अपने चरम पर होगा। दोनों देशों के बीच हुए पिछले मुकाबलों को देखते हुए यह उम्‍मीद करना बेमानी नहीं होगा। पूरी दुनिया में खेली जा रही क्रिकेट पर नजर डालें, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत-ऑस्‍ट्रेलिया का मुकाबला दुनिया का सबसे बड़ा और कड़ा मुकाबला हो गया है। इस सीरीज में एक ओर ऑस्‍टेलिया है, जो विश्‍व क्रिकेट के शिखर काबिज है तो दूसरी ओर भारत है, जो क्रिकेट में ऑस्‍ट्रेलियाई सत्‍ता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

भारत और ऑस्‍ट्रेलिया के बीच खेली जा रही यह सीरीज कितनी बड़ी है, इस बात का अंदाजा दोनों ओर से हो रही बयानबाजी से ही लगाया जा सकता है। ऑस्‍ट्रेलिया के पूर्व और वर्तमान दोनो ही खिलाड़ी इसे इंग्‍लैंड के साथ होने वाले अपने सबसे पुराने मुकाबले ‘एशेज’ से भी बड़ी मान रहे हैं। जी हां, साइमन कैटिच हों या‍ एडम गिलक्रिस्‍ट हां या फिर और भी पहले के खिलाड़ी और श्रीलंका के पूर्व कोच डेव वॉटमोर, इन सबका यही कहना है। वहीं दुनिया के महानतम बल्‍लेबाजों में से एक सचिन तेंदुलकर इसे सांस थमा देने वाले भारत-पाकिस्‍तान के मुकाबले से बड़ा मानते हैं। अगर सचिन और गिलक्रिस्‍ट जैसे धुरंदर यह बात कहते हैं इस बात में दम होना लाजमी है।

भारत-ऑस्‍ट्रेलिया के बाच खेले गए मैचों पर नजर डालें तो यह बात साफ हो जाती है। 1996 में शुरू हुई बार्डर-गावस्‍कर ट्राफी अभी तक सात बार खेली गई है, जिसे भारत और ऑस्‍ट्रेलिया दोनों ने 3-3 बार जीता है। 2003-04 में यह सीरीज 1-1 से ड्रा रही थी। इसमें अभी तक कुल 22 मैच खेले गए हैं जिनमें से 10 बार आस्‍ट्रेलिया विजयी रहा है और 8 बार भारत ने जीत का स्‍वाद चखा है, ज‍बकि 4 मैच ड्रा रहे। ये आंकड़े दोनों देशों के बीच कड़ी प्रतिस्‍पर्द्धा की तस्‍वीर पेश करते हैं। सचिन-वार्न, द्रविड़-मॅक्‍ग्राथ, हरभजन-पोंटिंग, लक्ष्‍मण-गिलेस्‍पी, कुंबले-गिलक्रिस्‍ट के बीच संघर्ष को भला कौन भूल सकता है। इनमें से कई नाम इस बार नहीं हैं, लेकिन इस बार भी वहीं संघर्ष होने की उम्‍मीद है, भले ही इसमें पात्र बदल जाएं।
दोनो टीमों के बीच की जंग अब सिर्फ बल्‍ले और गेंद तक ही सिमट कर नहीं रह गई है। स्‍लेजिंग की जिस कला में ऑस्‍ट्रेलियाई महारथ रखते हैं, भारत उसमें भी उन्‍हें बराबरी की टक्‍कर दे रहा है। भारत लगातार ऑस्‍ट्रेलिया की सत्‍ता को चुनौती दे रहा है, उसके नजदीक पहुंच रहा है और इस बात से कंगारू भी वाकिफ हैं। दोनों देशों के खिलाडियों को भी यह अच्‍छी तरह पता है कि मुकाबला काफी अहम है। इसलिए खिलाड़ी इसमें अपनी पूरी ताकत झोंकने को तैयार रहते हैं। भारत जानता है कि विश्‍व चैंपियन को हराने का क्‍या मतलब होता है। वहीं ऑस्‍ट्रेलिया को भी पता है कि भारत को उसके घर में हराना सबसे मुश्किल काम है।

भारत-ऑस्‍ट्रेलिया सीरीज की चमक बढ़ने की वजहें हैं। ऐसा कोई एक दिन में नहीं हुआ है। पहले ऐशेज को दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित सीरीज होने का रुतबा हासिल था। लेकिन, पिछले दो दशक के दौरान ऑस्‍ट्रेलिया की मजबूत होती गई, तो इंग्‍लैंड पिछड़ता गया। लिहाजा, एशेज एकतरफा मुकाबला बनके रह गया और इसकी चमक फीकी पड़ गई। 2005 में 16 साल बाद इंग्‍लैंड ने ऑस्‍ट्रेलिया को हराकर थोड़ी उम्‍मीद जगाई थी, लेकिन यह जीत सिर्फ तुक्‍का ही साबित हुई। ऑस्‍ट्रेलिया ने अगली एशेज में इंग्‍लैंड को 5-0 से धो दिया। एक मौके को छोड़ दिया जाए तो पिछले दो दशक में एशेज एकतरफा शो ही रहा है।

कुछ सालों पहले तक भारत-पाकिस्‍तान के बीच मुकाबलों को क्रिकेट से ज्‍यादा एक जंग के तौर पर देखा था। इन दोनों देशों के मैच दुनिया में सबसे ज्‍यादा देखे जाते थे। इन मैचों में दोनों देशों के अप्रिय सियासी रिश्‍तों की बानगी देखने को मिलती थी। ऐसा लगता था कि मैच में हार-जीत नहीं, दोनों देशों की किस्‍मत दांव पर लगी है। सन् 1986 में शारजाह में हुए ऑस्‍ट्रेलेशिया कप के फाइनल में चेतन शर्मा द्वारा फेंकी गई मैच की आखिरी गेंद पर जावेद मियांदाद के छक्‍के ने इस तनाव भरे रोमांच को एक नया आयाम दे दिया। भारत उस हार से लंबे अर्से तक नहीं उबर पाया। लेकिन, वक्‍त के साथ दोनों देशों के सियासी रिश्‍तों और क्रिकेट मैच, दोनों के उबाल में कमी आ गई और क्रिकेट जंग के बजाए एक खेल में तब्‍दील होता नजर आने लगा। ऐसा नहीं है कि भारत-पाक मुकाबलों का रोमांच कम हो गया है, लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि वह तनाव अब उस रूप में नहीं है।

भारत-ऑस्‍ट्रेलिया के बीच जबर्दस्‍त स्‍पर्द्धा को देखते हुए यह कहना बेमानी नहीं होगा कि एशेज का रुतबा और भारत-पाक मुकाबलों का तनाव, दोनों अब बार्डर-गावस्‍कर ट्रॉफी के साथ जुड़ गए हैं। यही वजह है कि दुनिया भर के क्रिकेटप्रेमियों की निगाहें इस सीरीज पर लगी हुई हैं।

Thursday, September 4, 2008

मौके को भुनाने में माहिर हैं माही

करीब चार साल पहले भारतीय टीम में जगह बनाने वाले महेंद्र सिंह धोनी आज भारतीय किक्रेट के सबसे चमकते सितारे हैं। इतने कम समय में उन्‍होंने क्रिकेट के बारे में जो समझ विकसित की है, वह काबिले-दाद है। यही वजह है कि कप्‍तान रूप में ट्वेंटी-20 और वनडे में उनके प्रदर्शन को देखते हुए लोग उन्‍हें टेस्‍ट टीम की कप्‍तानी सौंपने की बात कह रहे हैं। इस कड़ी में सबसे नया नाम टीम इंडिया के कोच गैरी कर्स्‍टन का है।

भारत मल्‍होत्राभारत-श्रीलंका वनडे सीरीज का तीसरा मैच। 91 रन पर भारत के चार खिलाड़ी आउट हो चुके थे। ऐसे हालात में धोनी नम्‍बर 6 पर बल्‍लेबाजी करने आते हैं। पहले सुरेश रैना के साथ 54 रनों की साझेदारी और उसके बाद रो‍हित शर्मा के साथ 67 रनों की साझेदारी। इन दो अहम साझेदारियों की बदौलत भारत का स्‍कोर 200 के पार पहुंचता है। 23वें ओवर में बल्‍लेबाजी करने आए धोनी 49 वें ओवर तक बल्‍लेबाजी कर 76 रन बनाते हैं। भारत यह मैच जीत कर सीरीज में 2-1 की बढ़त हासिल करता है।इससे अगले मैच में रैना शानदार बल्‍लेबाजी कर रहे थे, विराट कोहली के आउट होने के बाद (81/3) धोनी नम्‍बर इस बार पांच पर बल्‍लेबाजी करने आते हैं। वजह, रैना के साथ मिलकर रन गति को बनाए रखना। धोनी का यह तीर पर निशाने पर लगा। उनके और रैना के बीच 143 रनों की साझेदारी की बदौलत पहली बार (और अंतिम बार भी) स्‍कोर 250 के पार पहुंचता है। दोनों टीमों की ओर से यह सीरीज में एक पारी का उच्‍चतम स्‍कोर था। भारत यह मैच जीत कर सीरीज में 3-1 में निर्णायक बढ़त हासिल कर लेता है। ये दोनो उदाहरण यह दिखाते हैं धोनी परिस्थितियों को पढ़कर उसके हिसाब से खुद को ढालने में कितने माहिर हैं। वह जानते है कि कब, कौन सा फैसला टीम के लिए फायदेमंद होगा। उनकी इसी खूबी ने भारतीय कोच गैरी कर्स्‍टन को भी उनका दीवाना बना दिया है। आखिर, कोच को भी कहना ही पड़ा कि धोनी अब टेस्‍ट कप्‍तानी संभालने के लिए तैयार हैं।

वैसे, धोनी के टेस्‍ट कप्‍तान बनने की सुगबुआहट तो काफी समय पहले ही शुरू हो गई थी, मगर अब जब कर्स्‍टन की ओर से यह बयान आया है तो इस बात को और बल मिला है कि अब धोनी के टेस्‍ट कप्‍तान बनने में ज्‍यादा देर नहीं है। यह बात सही है कि अब अनिल कुंबले ज्‍यादा वक्‍त तक क्रिकेट नहीं खेल पाएंगें। आखिर वे अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर हैं। इन हालातों में धोनी ही सबसे ताकतवर विकल्‍प के तौर पर सामने आते हैं। धोनी के अलावा वीरेन्‍द्र सहवाग भी कुंबले का विकल्‍प बन सकते हैं, मगर इस दौड़ में वे काफी पिछड़ते नजर आ रहे हैं। रही बात युवराज की, तो उनके लिए टीम में अपनी जगह बचाना ही काफी मुश्किल नजर आ रहा है। ऐसे में कप्‍तानी की बात तो काफी दूर की कौड़ी नजर आती है। साल 2004 में भारतीय टीम में कदम रखने वाले महेंद्र सिंह धोनी ने बहुत जल्‍दी कामयाबी की उचाईयां छू ली हैं। साल 2007 में इंग्‍लैंड दौरे से आने के बाद जब धोनी को ट्वेंटी-20 और वनडे टीम की कमान सौंपी गई, तब टीम सही मायनों में काफी परेशानियों से जूझ रही थी। उस संकट की घड़ी से टीम को निकालकर ट्वेंटी-20 विश्‍व कप विजेता बनाना और उसके बाद ऑस्‍ट्रेलिया में कॉमनवेल्‍थ बैंक सीरीज में जीत हासिल करना धोनी के करियर की सबसे बड़ी कामयाबियां कही जा सकती हैं। हाल ही में श्रीलंका को उसी के घर में वनडे में मात देकर धोनी ने एक और बड़ी कामयाबी हासिल की है। कोच कर्स्‍टन भी इस राय से इत्‍तेफाक रखते हैं कि धोनी सर्वश्रेष्‍ठ वनडे बल्‍लेबाजों में शुमार है और अपने प्रदर्शन के दम पर खेल का रुख बदलने का माद्दा रखते हैं। टीम वनडे मुकाबलों में उनकी कप्‍तानी में जीत भी हासिल कर रही है। धोनी ने कप्‍तान बनने के बाद अपनी बल्‍लेबाजी करने के तरीके में भी बदलाव किए हैं।

धोनी ने अपने करियर की शुरुआत एक आक्रामक बल्‍लेबाज के तौर पर की। अपने पांचवें ही मैच में धोनी ने पाकिस्‍तान के खिलाफ शानदार 148 रनों की नाबाद पारी खेली। उसके बाद श्रीलंका के खिलाफ भी जयपुर में धोनी ने धुंआधार 183 रन रन बनाए। मगर, धोनी अब सिर्फ धूम-धूम में ही विश्‍वास नहीं रखते। परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालकर मैच को विरोधी के पंजे से खींचकर लाना धोनी की आदत सी हो गई है।

विरोधी टीमें जानती हैं कि धोनी के विकेट की अहमियत क्‍या है। धोनी खुद भी अपने विकेट की कीमत पहले से बेहतर समझते हैं। अगर विकेट पर टिककर बल्‍लेबाजी करने की जरूरत है तो धोनी उसी के हिसाब से बल्‍लेबाजी कर पारी को आगे बढ़ाते हैं। साथ ही, बीच-बीच में कमजोर गेंद पर प्रहार कर गेंदबाजों को हावी होने का मौका भी नहीं देते। गियर बदलने में उन्‍हें देर नहीं लगती। असल में वे जानते हैं कि कैसे धीरे-धीरे अपने लक्ष्‍य की बढ़ते हुए रफ्तार में बदलाव करना है।

अगर इस बात को आंकड़ों की नजर से देखा जाए तो, 120 वनडे खेल चुके धोनी का करियर औसत 47।81 है, वहीं 36 मैचों में बतौर कप्‍तान उन्‍होंने 57.83 की औसत से रन बनाए हैं। इससे पता चलता है कि वे कप्‍तानी की जिम्‍मेदारी से टूटने वाले खिलाडियों में से नहीं है, बल्कि यह जिम्‍मेदारी उन्‍हें और मजबूत बनाती है। कप्‍तान, विकेटकीपर और बल्‍लेबाज की तिहरी भूमिका निभाने वाले धोनी सभी जिम्‍मेदारियों को अच्‍छी तरह से निभाने में सक्षम रहें हैं। नम्‍बर 5 या 6 पर कठिन परिस्थितियों में बल्‍लेबाजी कर धोनी कई बार टीम के लिए संकटमोचक की भूमिका निभा चुके हैं। जिन 36 मैचों में धोनी ने कप्‍तानी की है उनमें से 19 बार टीम को जीत मिली है और 14 में हार। जीते हुए मुकाबलों में धोनी का औसत 82.44 का है, वहीं जिन मैचों में टीम हारी है उनमें उनका औसत गिरकर 32.07 रह जाता है। यह बात साबित करती है कि धोनी का प्रदर्शन टीम की जीत में अहम रोल अदा करता है।

कप्‍तान के तौर पर धोनी में जोखिम लेने की हिम्‍मत भी नजर आती है। वे लकीर के फकीर बनने के बजाए जीत हासिल करने के लिए नए तरीके आजमाने से पीछे नहीं हटते। चौथे मैच में ही सनत जयसूर्या भारतीय गेंदबाजों के लिए खतरा बनते जा रहे थे, ऐसे मौके पर धोनी गेंद हरभजन सिंह को थमाते हैं। हरभजन भी अपने कप्‍तान के फैसले को सही साबित करते हुए जयसूर्या को आउट कर देते हैं। कप्‍तानी की समझ के बारे में कहा जाए तो धोनी प्रयोग करने से नहीं डरते और अपने फैसले के परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहते हैं। वे हार और जीत दोनो के लिए किसी एक को नहीं, बल्कि उसे टीम की साझा जिम्‍मेदारी मानते हैं। यह एक कप्‍तान की सबसे बड़ी खूबी है जो व्‍यक्गित
आरोपों से बचते हुए पूरी टीम को साथ लेकर चलने की कला जानता हो।
धोनी के पूर्व के कप्‍तानों के प्रदर्शन पर देखा जाए तो राहुल द्रविड़ ने 79 वनडे मैचों में भारत की कप्‍तानी की। बतौर कप्‍तान उन्‍होंने 42 से ज्‍यादा की औसत से रन बनाए, जबकि उनका करियर औसत 39.49 का ही है। सचिन तेंदुलकर के लिए कप्‍तानी एक बुरे दौर की तरह रही। अपने 73 मैचों के कप्‍तानी के सफर में सचिन का औसत 37.75 ही रहा, जबकि उनका करियर औसत 44 के ज्‍यादा है। सचिन की बल्‍लेबाजी पर कप्‍तानी का दबाव साफ तौर पर देखा जा सकता था। धोनी जानते हैं कि उन्‍हें टीम के युवा खिलाडियों से कैसे काम कराना है। युवाओं को तरजीह देने के कारण कई बार उनकी तुलना सौरव गांगुली से भी की जाती है जिन्‍होने अपनी कप्‍तानी में युवाओं की टीम बनाने का काम किया था।